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सागर आठमा मेहरे का (श्रीराजजीकी कृपाका आठवां सागर)
और सागर जो मेहरे का, सो सोभा अित लेत।
लेहरे ें आवे मेहरे सागर, खूबी सुख समेत।।१
हुकम मेहरे के हाथ में, जोस मेहरे के अंग।
इसक आवे मेहरे से, बेसक इलम ितन संग।।२
पूरी मेहरे िजत हक की, ितत और कहा चािहयत।
हक मेहरे ितत होत है, िजत असल है िनसबत।।३
मेहरे होत अव्वल से, इतहीं होत हुकम।
जलुस साथ सब ितनके, कछू कमी न करत खसम।।४
ए खेल हुआ मेहरे वास्ते, माहें खेलाए सब मेहरे ।
जाथें मेहरे जुदी हुई, तब होत सब जेहरे ।।५
दोऊ मेहरे देखत खेल में, लोक देखे ऊपर का जहूर।
जाए अन्दर मेहरे कछू नहीं, आखर होत हक से दू र।।६
मेहरे सोई जो बातूनी, जो मेहरे बाहेर और मािहं ।
आखर लग तरफ धनीकी, कमी कछु ए आवत नािहं ।।7
मेहरे होत है िजन पर, मेहरे देखत पांचों तत्व।
िपं ड ब्रह्मांड सब मेहरे के, मेहरे के बीच बसत।।८
ए दुख रूपी इन िजमीमें, दुख न काहूं देखत।
बात बडी है मेहरे की, जो दुखमें सुख लेवत।।९
सुख में तो सुख दायम, पर स्वाद न आवत ऊपर।
दुख आए सुख आवत, सो मेहरे खोलत नजर।।१०
इन दुख िजमी में बैठके, मेहरे ें देखे दुख दू र।
कायम सुख जो हक के, सो मेहरे करत हजूर।।११
मैं देख्या िदल िवचार के, इसक हक का िजत।
इसक मेहरे से आइया, अव्वल मेहरे है ितत।।१२
मैं देख्या िदल िवचार के, इसक हक का िजत।
इसक मेहरे से आइया, अव्वल मेहरे है ितत।।१२
अपना इलम िजन देत हैं, सो भी मेहरे से बेसक।
मेहरे सब िवध ल्यावत, िजत हुकम जोस मेहरे हक।।१३
जाको लेत हैं मेहरे में, ताए पेहल
े े मेहरे ें बनावे वजूद।
गुन अंग इं द्री मेहरे की, रूह मेहरे फूकत माहें बूंद।।१४
मेहरे िसं घासन बैठक, और मेहरे चंवर िसर छत्र।
सोहोबत सैन्या मेहरे की, िदल चाहे मेहरे बाजंत्र।।१५
बोली बोलावे मेहरे की, और मेहरे ै का चलन।
रात िदन दोऊ मेहरे में, होए मेहरे ें िमलावा रूहन।।१६
बंदगी िजकर मेहरे की, ए मेहरे हक हुकम।
रूहें बैठी मेहरे छाया िमने, िपएं मेहरे रस इसक इलम।।१7
िजत मेहरे ितत सब हैं, मेहरे अव्वल लग आखर।
सोहोबत मेहरे देवहीं, कहूं मेहरे िसफत क्यों कर।।१८
एह जो दिरया मेहरे का, बातून जाहेर देखत।
सब सुख देखत तहां, मेहरे िजत बसत।।१९
बीच नाबूद दुनीय के, आई मेहरे हक िखलवत।
ितन से सब कायम हुए, मेहरे ै की बरकत।।२०
वरनन करूं क्यों मेहरे की, िसफत ना पोहोंचत।
ए मेहरे हककी बातूनी, नजर माहें बसत।।२१
ए मेहरे करत सब जाहेर, सबका मता तोलत।
जो िकन कानों ना सुन्या, सो मेहरे मगज खोलत।।२२
वरनन करूं क्यों मेहरे की, जो बसत हक के िदल।
जाको िदलमें लेत हैं, तहां आवत न्यामत सब िमल।।२३
वरनन करूं क्यों मेहरे की, जो बसत है माहें हक।
जाको िनवाजें मेहरे में, ताए देत आप माफक।।२४
वरनन करूं क्यों मेहरे की, जो बसत है माहें हक।
जाको िनवाजें मेहरे में, ताए देत आप माफक।।२४
बात बडी है मेहरे की, िजत मेहरे ितत सब।
िनमख ना छोडें नजर से, इन ऊपर कहा कहू◌ूं अब।।२५
जहां आप तहां नजर, जहां नजर तहां मेहरे ।
मेहरे िबना और जो कछू, सो सब लगे जेहरे ।।२६
बात बडी है मेहरे की, मेहरे होए ना िबना अंकुर।
अंकुर सोई हक िनसबती, माहें बसत तजल्ला नूर।।२7
ज्यों मेहरे त्यों जोस है, ज्यों जोस त्यों हुकम।
मेहरे रेहत
े नूर बल िलएं , तहां हक इसक इलम।।२८
मीठा सुख मेहरे सागर, मेहरे में हक आराम।
मेहरे इसक हक अंग है, मेहरे इसक प्रेम काम।।२९
काम बडे इन मेहरे के, ए मेहरे इन हक।
मेहरे होत िजन ऊपर, ताए देत आप माफक।।३०
मेहरे ें खेल बनाइया, वास्ते मेहरे मोमन।
मेहरे ें िमलावा हुआ, और मेहरे िफरस्तन।।३१
मेहरे ें रसूल होए आइया, मेहरे ें हक िलए फुरमान।
कुंजी ल्याए मेहरे की, करी मेहरे ें हक पेहच
े ान।।३२
दै मेहरे ें कुंजी इमाम को, तीनों महंमद सूरत।
मेहरे ें दई िहकमत, करी मेहरे ें जाहेर हकीकत।।३३
सो फुरमान मेहरे ें खोिलया, करी जाहेर मेहरे ें आखरत।
मेहरे े समझे मोमन, करी मेहरे ें जाहेर िखलवत।।३४
ए मेहरे मोिमनों पर, एही खासल खास उमत।
दई मेहरे ें िभस्त सबन को, सो मेहरे मोिमनों बरकत।।३५
मेहरे ें खेल देख्या मोिमनों, मेहरे ें आए तलें कदम।
मेहरे ें क्यामत करके, मेहरे ें हंसके िमले खसम।।३६
मेहरे ें खेल देख्या मोिमनों, मेहरे ें आए तलें कदम।
मेहरे ें क्यामत करके, मेहरे ें हंसके िमले खसम।।३६
मेहरे की बातें तो कहूं, जो मेहरे को होवे पार।
मेहरे ें हक न्यामत सब मापी, मेहरे ें मेहरे को नाहीं सुमार।।३7
जो मेहरे ठाढी रहे, तो मेहरे मापी जाए।
मेहरे पलमें बढे कोट गुनी, सो क्यों मेहरे ें मेहरे मपाए।।३८
मेहरे ें िदल अरस िकया, िदल मोिमन मेहरे सागर।
हक मेहरे ले बैठे िदलमें, देखो मोिमनों मेहरे कादर।।३९
बात बडी है मेहरे की, हक के िदल का प्यार।
सो जाने िदल हक का, या मेहरे जाने मेहरे को सुमार।।४०
जो एक वचन कहूं मेहरे का, ले मेहरे समिझयो सोए।
अपार उमर अपार जुबांए, तो मेहरे को िहसाब न होए।।४१
िनपट बडा सागर आठमा, ए मेहरे को नीके जान।
जो मेहरे होए तुझ ऊपर, तो मेहरे की होए पेहच
े ान।।४२
सात सागर वरनन िकए, सागर आठमा िबना िहसाब।
ए मेहरे को पार न आवहीं, जो कै कोट करूं िकताब।।४३
ए मेहरे मोिमन जानहीं, िजन ऊपर है मेहरे ।
ताको हक की मेहरे िबना, और देखें सब जेहरे ।।४४
महामत कहे ऐ मोिमनो, ए मेहरे बडा सागर।
सो मेहरे हक कदमों तलं◌े, पीओ अमीरस हक नजर।।४५
meher_sager.pdf (PDF, 67.66 KB)
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